राम मंदिर सिर्फ एक इमारत नहीं है, ये करोड़ों हिंदुओं की सदियों की आस्था और उम्मीद है। 22 जनवरी 2024 को मंदिर बनकर तैयार हुआ, और तब से यहां रोज़ाना करीब एक से डेढ़ लाख श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। लोग अपनी श्रद्धा से पैसा, सोना, चांदी, गहने जो भी बन पड़े दान करते हैं। लेकिन अब इसी दान को लेकर एक ऐसा विवाद खड़ा हो गया है, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है, और लोग इसे "चढ़ावा चोरी" या "चंदा चोरी कांड" कह रहे हैं।
मंदिर चलाता कौन है
सबसे पहले ये समझना ज़रूरी है कि मंदिर का पूरा कामकाज कौन देखता है। मंदिर के निर्माण और प्रबंधन की ज़िम्मेदारी श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पास है। ये ट्रस्ट सुप्रीम कोर्ट के 2019 वाले फैसले के बाद केंद्र सरकार ने बनाया था, ताकि मंदिर का निर्माण और उससे जुड़ा सारा काम व्यवस्थित तरीके से हो सके। दिलचस्प बात ये है कि ये ट्रस्ट एक स्वायत्त यानी ऑटोनॉमस चैरिटेबल संस्था है, जो अपने खुद के नियमों से चलती है। इसका मतलब ये है कि इसे RTI यानी सूचना के अधिकार कानून के तहत जवाबदेह नहीं माना जाता, और कई बार लोगों ने जब जानकारी मांगी, तो उन्हें यही जवाब मिला कि ट्रस्ट एक स्वतंत्र संस्था है।
ट्रस्ट में चंपत राय जैसे बड़े नाम शामिल हैं, जो महासचिव के तौर पर मंदिर का सबसे जाना-पहचाना चेहरा रहे हैं। चंपत राय पहले विश्व हिंदू परिषद यानी VHP के साथ लंबे समय तक जुड़े रहे, और आरएसएस से भी उनका पुराना नाता है। उनके साथ अनिल मिश्रा भी ट्रस्ट के एक अहम सदस्य हैं, जिनके ऊपर मंदिर की सारी खरीद-बिक्री की देखरेख की ज़िम्मेदारी रहती है। इनका दफ्तर उसी काउंटिंग सेंटर के बगल में है, जहां रोज़ चढ़ावे की गिनती होती है।
पैसा कैसे गिना जाता है
अब बात करते हैं कि रोज़ाना आने वाला इतना बड़ा दान आखिर मैनेज कैसे होता है। मंदिर परिसर में जगह-जगह हुंडी यानी दान पेटियां रखी हैं। इन पेटियों को खोलने का काम कम से कम चार अधिकृत लोगों की मौजूदगी में होता है, जिसमें ट्रस्ट के प्रतिनिधि और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया यानी SBI के अधिकारी शामिल रहते हैंजाती थी। थी। थी। थी। थी। थी।सा इकट्ठा करके लोहे के लॉक्ड कंटेनर में डाला जाता है और CCTV निगरानी में गिनती केंद्र तक पहुंचाया जाता है।
गिनती के इस पूरे काम में करीब पचास लोग शामिल रहते हैं। इनमें से कुछ लोग SBI ने एक प्राइवेट एजेंसी सैनिक सिक्योरिटी सर्विसेज़ के ज़रिए हायर किए थे, जो नोटों की गड्डियां बनाने का काम करते थे, और बाकी ट्रस्ट के अपने कर्मचारी इन पर निगरानी रखते थे। शुरुआत में रोज़ाना का दान 8 से 13 लाख रुपये के आसपास बताया जाता था, लेकिन कई दिन ऐसे भी आते थे जब ये आंकड़ा 50 से 60 लाख रुपये तक पहुंच जाता था। एक महीने में मंदिर को 25 करोड़ रुपये तक का दान मिलने की भी खबरें आई हैं।
पहली चेतावनी जो अनसुनी रह गई
यहां एक बहुत दिलचस्प और चौंकाने वाली बात सामने आई है। एसआईटी जांच शुरू होने से करीब छह साल पहले ही, एक ऑडिट फर्म ने अपनी रिपोर्ट में साफ लिखा था कि मंदिर के दान का कोई व्यवस्थित रिकॉर्ड नहीं रखा जा रहा। यानी गड़बड़ी की आशंका बहुत पहले से थी, लेकिन उस चेतावनी पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
इतना ही नहीं, खुद SBI ने भी घोटाला सामने आने से करीब तीन महीने पहले ही ट्रस्ट को लिखित में सुझाव दिया था कि गिनती में लगे कुछ कर्मचारियों को हटा दिया जाए, क्योंकि उनके काम करने के तरीके पर सवाल उठ रहे थे। लेकिन सूत्रों का कहना है कि चंपत राय और अनिल मिश्रा के प्रभाव के आगे बैंक अपनी बात मनवा नहीं पाया, और वो स्टाफ वहीं बना रहा, और चोरी बेरोकटोक चलती रही।
चोरी हुई कैसे, हिडन कैमरे में क्या दिखा
मई महीने के आखिर में जब ट्रस्ट के अधिकारियों ने बैंकों में जमा हो रही रकम की तुलना दान पेटियों के रोज़ के रिकॉर्ड से की, तो हिसाब में गड़बड़ी नज़र आई। हर दान पेटी में औसतन सात से आठ लाख रुपये होते थे, लेकिन पांच सौ के नोटों की गड्डियों में लगातार कई हफ्तों तक कमी दिखने लगी। शक होने पर गिनती वाले कमरे में गुपचुप तरीके से हिडन कैमरे लगाए गए।
एक हफ्ते की फुटेज देखने के बाद जो सामने आया वो चौंकाने वाला था। कुछ कर्मचारी जानबूझकर सामने वाले CCTV कैमरे का व्यू ब्लॉक कर देते थे, और इसी दौरान उनके साथी नोटों की तैयार गड्डियों में से करेंसी निकालकर अपने कपड़ों में छिपा लेते थे। चोरी किया हुआ पैसा पहले मंदिर परिसर के ही टॉयलेट में छिपाया जाता, और मौका मिलते ही उसे बाहर निकाल लिया जाता। बाद में ये रकम अलग जगह जाकर आपस में बांटी जाती थी। एक तरीका ये भी था कि गिनती के दौरान गड्डियों में जानबूझकर एक्स्ट्रा नोट डाल दिए जाते थे, और चूंकि बैंक सिर्फ गड्डियों की संख्या चेक करता था, हर नोट अलग से नहीं गिनता था, तो वाउचर उसी बढ़ी हुई गिनती के हिसाब से बन जाता। बैंक ले जाते वक्त रास्ते में ये एक्स्ट्रा नोट निकाल लिए जाते, जिससे जमा हुई रकम कागज़ पर तो सही दिखती, पर असल में पैसा कम पहुंचता।
एसआईटी की जांच में ये भी सामने आया कि ये कोई एक झटके में की गई बड़ी डकैती नहीं थी, बल्कि रोज़ थोड़ी-थोड़ी करके होने वाली चोरी थी, जो हफ्तों और महीनों में जुड़कर एक बड़ी रकम बन गई।
चेहरे जो सामने आए
जांच में कई नाम सामने आए। राम शंकर यादव उर्फ टिन्नू, जो ट्रस्ट के सेवादार थे और गिनती वाले कमरे की चाबी भी उन्हीं के पास रहती थी। वो VIP मेहमानों की विजिट मैनेज करने में भी मदद करते थे, और खुद चंपत राय के पर्सनल ड्राइवर भी बताए जाते हैं। इनके अलावा अनुकल्प मिश्रा और उनके साले लवकुश मिश्रा का नाम भी आया, जिन पर वाउचर बनाने के दौरान गड़बड़ी करने का आरोप है। अविनाश शुक्ला नाम के एक आरोपी से तो ट्रस्ट ने पुलिस केस दर्ज होने से पहले ही अपनी तरफ से 58 लाख रुपये बरामद कर लिए थे। रत्नेश चतुर्वेदी और गगनदीप सिंह भी इस मामले में शामिल बताए जाते हैं, जो किसी ट्रस्ट सदस्य के रिश्तेदार तो नहीं हैं, पर चंपत राय के करीबी माने जाते हैं।
व्हिसलब्लोअर की कहानी
इस पूरे मामले में एक नाम बार-बार सामने आता है, महिपाल सिंह। ये मंदिर में अकाउंट्स इंचार्ज का काम देखते थे। उनका दावा है कि उन्होंने गड़बड़ी की जानकारी सबसे पहले चंपत राय और ट्रस्ट के एक और सदस्य गोपाल को दी थी। लेकिन आरोप है कि शिकायत करने के अगले ही दिन उन्हें उनके पद से हटा दिया गया। उन्होंने ये भी लिखा कि जिन संस्थाओं का नाम भगवान राम से जुड़ा है, उन्हें पारदर्शिता के सबसे ऊंचे मापदंड पर खरा उतरना चाहिए, क्योंकि करोड़ों भक्तों ने अपनी आस्था और जीवन भर की कमाई मंदिर निर्माण के लिए दी है। महिपाल सिंह का यह भी दावा है कि मंदिर परिसर के करीब आठ महीने के CCTV फुटेज डिलीट कर दिए गए, जिससे शक और गहरा हो गया।
गिरफ्तारियां और बरामदगी
जांच आगे बढ़ी तो पुलिस ने आठ लोगों को गिरफ्तार कर लिया, जिनमें से सात को शुरुआत में और आखिर में सभी आठों को अदालत में पेश कर जेल भेज दिया गया। इन आरोपियों के पास से करीब 80 लाख रुपये नकद, सोना, और यहां तक कि विदेशी करेंसी डॉलर तक बरामद हुए। एसआईटी को जांच के दौरान WhatsApp चैट डिलीट होने और मोबाइल फोन फॉर्मेट किए जाने के सबूत भी मिले, जिससे लगता है कि डिजिटल एविडेंस मिटाने की भी कोशिश हुई।
ये भी पता चला कि जिस RMO यानी रीजनल मीडिया ऑफिसर अर्जुन देव के पास मंदिर के करीब 1600 CCTV कैमरों की निगरानी की ज़िम्मेदारी थी, उन्हें 17 साल बाद अचानक गोरखपुर ट्रांसफर कर दिया गया, ठीक उसी वक्त जब जांच चल रही थी।
सरकार का कदम
मामला जब बहुत बढ़ गया, तो 13 जून 2026 को उत्तर प्रदेश सरकार ने तीन सदस्यों वाली एसआईटी यानी स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम बनाई, ताकि आरोपों की गहराई से जांच हो सके। एसआईटी ने मंदिर परिसर में घंटों समय बिताकर करीब बयालीस कर्मचारियों से पूछताछ की। जांच में सामने आया कि कहीं हुंडी की चाबियां लापता थीं, तो कहीं तय की गई एसओपी यानी स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर का खुलेआम उल्लंघन हो रहा था। एसआईटी ने अपनी शुरुआती रिपोर्ट यूपी सरकार को सौंप भी दी है।
राजनीति में उबाल
जैसा भारत में अक्सर होता है, ये मामला जल्दी ही राजनीति का अखाड़ा बन गया। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने सबसे पहले सोशल मीडिया पर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि बड़ी मछलियों को बचाया जा रहा है जबकि छोटे कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी कहा कि भगवान की भेंट, माला और चरण पादुका तक चोरी होना उन्हें गहरा दुख देता है। इसी बीच बीजेपी नेता बृजभूषण शरण सिंह के भी एक बयान ने सुर्खियां बटोरीं, जिसमें उन्होंने इशारा किया कि सच बोलने पर उन्हें मुश्किल हो सकती है।
भाजपा ने पलटवार करते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस वक्फ ज़मीन के मुद्दों पर तो चुप्पी साधे रहते हैं, लेकिन राम मंदिर के मामले में सियासत करने से नहीं चूकते। वहीं ट्रस्ट महासचिव चंपत राय ने शुरुआत में सात करोड़ रुपये गायब होने के आरोपों को सिरे से नकार दिया था।
पुरानी ज़मीन डील पर भी सवाल
ये पहली बार नहीं है जब ट्रस्ट पर सवाल उठे हों। साल 2021 में भी कई रिपोर्ट्स सामने आई थीं जिनमें दावा किया गया कि मंदिर के लिए ज़मीन खरीदने में भारी गड़बड़ी हुई। एक मामले में एक ज़मीन बीस लाख रुपये में खरीदी गई और कुछ ही महीनों बाद वही ज़मीन ट्रस्ट को ढाई करोड़ रुपये में बेच दी गई, और ये सौदा अयोध्या के मेयर के भतीजे से जुड़ा हुआ बताया गया। एक और मामले में ट्रस्ट ने ऐसे लोगों से ज़मीन खरीदी, जिन्हें बाद में धोखाधड़ी के मामलों में भगोड़ा घोषित किया गया।
इंजीनियर के आरोप और चांदी की ईंटें
एक इंजीनियर दीनानाथ वर्मा ने भी दावा किया कि उन्होंने मंदिर निर्माण के शुरुआती दौर में काम किया था, और तब उन्होंने एल्युमिनियम के काम के बिल डेढ़ गुना तक बढ़ाकर दिखाए जाने की बात उठाई थी। उनका आरोप है कि जब उन्होंने सवाल किया, तो उन्हें बताया गया कि ट्रस्ट सदस्य अनिल मिश्रा को चालीस प्रतिशत कमीशन देना ज़रूरी है, और सवाल उठाने की वजह से उन्हें काम से ही हटा दिया गया।
इसके अलावा सिंधी समुदाय की एक संस्था ने भी 2021 में मंदिर निर्माण के लिए दो सौ चांदी की ईंटें दान की थीं, लेकिन जब उन्होंने रसीद मांगी, तो उन्हें कहा गया कि पहले जांच रिपोर्ट आने के बाद ही रसीद दी जाएगी। सालों बाद भी इस बारे में स्पष्टता नहीं मिल पाई।
आखिर में सवाल यही उठता है
राम मंदिर का बनना करोड़ों हिंदुओं के लिए एक ऐतिहासिक और भावनात्मक पल था, जिसके लिए पांच सौ साल तक इंतज़ार किया गया। लेकिन जो चढ़ावा चोरी और ज़मीन घोटाले की खबरें अब सामने आ रही हैं, उन्होंने उसी आस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। लोग यही पूछ रहे हैं कि जब पहले से चेतावनियां मिल चुकी थीं, ऑडिट रिपोर्ट में गड़बड़ी लिखी जा चुकी थी, और खुद बैंक ने भी शक जताया था, तो समय रहते कदम क्यों नहीं उठाए गए। और जिन लोगों के कंधों पर करोड़ों भक्तों की आस्था और ज़िम्मेदारी थी, क्या उन्हें भी जवाबदेही से गुज़रना नहीं चाहिए।
मामला अभी भी जांच के दायरे में है, एसआईटी की पूरी रिपोर्ट आना बाकी है, और आने वाले दिनों में और भी नए खुलासे हो सकते हैं। फिलहाल इतना ज़रूर साफ है कि ये चोरी शायद किसी एक बड़े प्लान से नहीं हुई, लेकिन बरसों की लापरवाही, कमज़ोर सिस्टम और कुछ लोगों की मिलीभगत ने मिलकर करोड़ों की चपत लगा दी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
राम मंदिर चढ़ावा चोरी कांड आखिर है क्या
अयोध्या के राम मंदिर में रोज़ाना आने वाले करोड़ों रुपये के दान में गड़बड़ी के आरोप लगे हैं। कहा जा रहा है कि गिनती के दौरान कुछ कर्मचारी नोटों की गड्डियों में से पैसा निकालकर अपने पास रख लेते थे, और ये सिलसिला महीनों तक चलता रहा। इसी को लोग चढ़ावा चोरी या चंदा चोरी कांड कह रहे हैं।
ये मामला सबसे पहले कैसे सामने आया
बात पहले स्थानीय मीडिया की खबरों से शुरू हुई, और फिर 7 जून 2026 को समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर इस बारे में सवाल उठाए, जिसके बाद मामला बड़ी तेज़ी से राजनीतिक और राष्ट्रीय मुद्दा बन गया।
कितने पैसों की चोरी की बात कही जा रही है
शुरुआत में पांच से साढ़े सात करोड़ रुपये गायब होने की बात कही गई थी, लेकिन बाद में कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में ये आंकड़ा बढ़कर दो सौ करोड़ रुपये तक बताया गया। हालांकि एसआईटी की शुरुआती रिपोर्ट में इसे बड़ी सुनियोजित चोरी नहीं बल्कि रोज़ थोड़ी-थोड़ी करके होने वाली पिलफरेज बताया गया है।
अभी तक कितने लोग गिरफ्तार हो चुके हैं
अब तक आठ लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जिनमें गिनती के काम से जुड़े कर्मचारी शामिल हैं। इनके पास से नकद, सोना और विदेशी करेंसी तक बरामद हुई हैं।
व्हिसलब्लोअर महिपाल सिंह कौन हैं
महिपाल सिंह मंदिर में अकाउंट्स इंचार्ज का काम देखते थे। उनका दावा है कि उन्होंने गड़बड़ी की जानकारी सबसे पहले ट्रस्ट महासचिव चंपत राय को दी थी, लेकिन शिकायत के अगले ही दिन उन्हें पद से हटा दिया गया।
क्या ट्रस्ट को पहले से पता था
जी हाँ, ऐसा लगता है। एक ऑडिट फर्म ने छह साल पहले ही रिकॉर्ड में गड़बड़ी की चेतावनी दी थी, और खुद SBI ने भी घोटाला उजागर होने से तीन महीने पहले ही कुछ कर्मचारियों को हटाने की सिफारिश की थी। लेकिन आरोप है कि इन दोनों चेतावनियों पर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई।
क्या ये चोरी सिर्फ चढ़ावे तक सीमित है
नहीं, इसके अलावा 2021 के आसपास मंदिर के लिए ज़मीन खरीद में भी गड़बड़ी के पुराने आरोप सामने आ चुके हैं। एक इंजीनियर ने निर्माण कार्य में बिल बढ़ाकर दिखाने का दावा किया है, और चांदी की ईंटों के दान को लेकर भी सवाल उठे हैं।
क्या ट्रस्ट के बड़े अधिकारियों पर भी कार्रवाई हुई है
अब तक ज़्यादातर कार्रवाई गिनती से जुड़े जूनियर कर्मचारियों पर हुई है। कुछ सीनियर अधिकारियों ने नैतिक आधार पर इस्तीफा ज़रूर दिया है, लेकिन कई लोग यही सवाल उठा रहे हैं कि बड़े नामों को बचाया जा रहा है।
आगे क्या होने वाला है
एसआईटी की शुरुआती रिपोर्ट यूपी सरकार को सौंपी जा चुकी है, लेकिन पूरी और विस्तृत जांच रिपोर्ट अभी आना बाकी है। आने वाले दिनों में और गिरफ्तारियां और नए खुलासे होने की पूरी संभावना है।

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